Vishwa Samvad Kendra Jharkhand
Open menu
  • Home
  • About Us
  • News
  • Views
  • Interview
  • Personality
  • Photo Gallary
  • Book Review
  • Grievance
  • Contact Us
  1. You are here:  
  2. Home

भारत की योग परंपरा का इतिहास अत्यंत प्राचीन और विविध है – डॉ. रजनीश शुक्ल जी

भारत की योग परंपरा का इतिहास अत्यंत प्राचीन और विविध है – डॉ. रजनीश शुक्ल जी‘नामूलं लिख्यते किञ्चित’ व्याख्यानमाला में “भारत की विविध योग परंपरा का इतिहास” विषयक विशिष्ट व्याख्यान का आयोजन

नई दिल्ली। अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के केन्द्रीय कार्यालय में भारतीय इतिहास संकलन योजना समिति, दिल्ली प्रान्त एवं माधव संस्कृति न्यास के संयुक्त तत्वाधान में “नामूलं लिख्यते किञ्चित” व्याख्यानमाला के अंतर्गत “भारत की विविध योग परंपरा का इतिहास” विषयक विशिष्ट व्याख्यान का आयोजन किया गया।

व्याख्यानमाला के मुख्य वक्ता के रूप में आचार्य (डॉ.) रजनीश कुमार शुक्ल जी (पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा) ने मुख्य विषय “भारत की विविध योग परंपरा का इतिहास” पर व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि भारत की योग परंपरा का इतिहास अत्यंत प्राचीन और विविध है, इसकी जड़ें सिंधु-सरस्वती सभ्यता (2700 ईसा पूर्व) तक जाती हैं, और समय के साथ यह वेदों, उपनिषदों, महाभारत, भगवद्गीता, पतंजलि योगसूत्र, हठयोग, भक्ति योग और आधुनिक योग दिवस तक विकसित हुई हैं। आज योग भारतीय संस्कृति का वैश्विक प्रतीक बन चुका है।

डॉ. बालमुकुन्द पाण्डेय जी (राष्ट्रीय संगठन सचिव, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना) ने कहा कि दर्शन का क्रिया रूप योग है, योग उस दर्शन का व्यावहारिक रूप है। जहाँ दर्शन विचार देता है, वहीं योग उसे जीवन में उतारने की साधना है। दर्शन कहता है कि आत्मा शुद्ध है और परमात्मा से जुड़ सकती है। योग इस सत्य को अनुभव कराने का साधन है – ध्यान, प्राणायाम, आसन और आत्मनियंत्रण के माध्यम से। इसलिए कहा जाता है कि योग दर्शन का क्रियात्मक पक्ष है। दर्शन हमें मार्ग दिखाता है, और योग उस मार्ग पर चलने की साधना है।

व्याख्यान की अध्यक्ष पद्मश्री प्रो. बुद्ध रश्मि मणि जी (सुप्रसिद्ध पुरातत्वविद, इतिहासकार, कला समीक्षक, राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य, ABISY) ने कहा कि योग का उद्देश्य व्यक्ति की आत्मा को परमात्मा से जोड़ना है। आसन और प्राणायाम के माध्यम से शरीर और मन में संतुलन स्थापित होता है। योग केवल व्यक्तिगत साधना नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का भी माध्यम है। इसलिए योग को केवल व्यायाम या आसन तक सीमित नहीं किया जा सकता। इसका गहरा अर्थ है -जुड़ाव और एकत्व। योग हमें स्वयं से, समाज से और परम सत्य से जोड़ता है।

कार्यक्रम डॉ. पीयूष मिश्र के मंगलाचरण के साथ आरंभ हुआ। व्याख्यानमाला का संचालन डॉ. सौरभ कुमार मिश्र (उप निदेशक, ICHR, राष्ट्रीय प्रचार प्रमुख ABISY) ने किया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. संजीव कुमार मिश्र जी (स्नातकोत्तर शिक्षक, कार्यकारिणी सदस्य, दिल्ली प्रान्त) ने किया।

Page 9 of 47

  • 4
  • 5
  • 6
  • 7
  • 8
  • 9
  • 10
  • 11
  • 12
  • 13

Latest News

और भय को जीतकर जो आगे बढ़ती है, वह बनती है लक्ष्मीबाई

और भय को जीतकर जो आगे बढ़ती है, वह बनती है लक्ष्मीबाई

...
Read More
महाराणा प्रताप ने धर्म, संस्कृति, स्वाभिमान और राष्ट्रहित के लिए जीवनभर संघर्ष किया – डॉ. मोहन भागवत जी

महाराणा प्रताप ने धर्म, संस्कृति, स्वाभिमान और राष्ट्रहित के लिए जीवनभर संघर्ष किया – डॉ. मोहन भागवत जी

...
Read More
शताब्दी वर्ष में अधिकतम स्थानों पर शाखा लगाएंगे स्वयंसेवक

शताब्दी वर्ष में अधिकतम स्थानों पर शाखा लगाएंगे स्वयंसेवक

...
Read More
मानव कल्याण और राष्ट्र निर्माण का माध्यम बने वैज्ञानिक नवाचार – योगी आदित्यनाथ जी

मानव कल्याण और राष्ट्र निर्माण का माध्यम बने वैज्ञानिक नवाचार – योगी आदित्यनाथ जी

...
Read More

Login Form

  • Forgot your password?
  • Forgot your username?

Copyright © 2025 Vishwa Samvad Kendra Jharkhand. All Rights Reserved.